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рдЧुрд░ुрд╡ाрд░, 3 рдордИ 2018
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рдоंрдЧрд▓рд╡ाрд░, 17 рдЕрдк्рд░ैрд▓ 2018
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विषय-साहित्य और समाज
समाज तन है और साहित्य मन । समाज सेव्य है साहित्य सेवक । साहित्य हमेसा ही समाज की दिशा और दशा मे सुधार करता है । जैसे छोटे से पौधे को खाद, पानी, वायु,आदि मिलने से कालांतर मे वह एक विशालतम वृक्ष मे परिवर्तित हो जाता है उसी प्रकार से साहित्य भी समाज को प्रचुर मात्रा मे दुर्गणों का बोध कराते हुए ,सद्गुणों के बीज बोता है । साथ ही साथ सामाजिक कुरीतियों, विघटनकारी परम्पराओं ,जातीय बिसङ्गतियों पर व्यंग्य वाणों से प्रहार करके बड़ी शालीनता से जनमानस मे मानवतावादी दृष्टिकोण उपजाता है ।
साहित्य हमेशा सभ्य समाज की कल्पना करता है । निर्माण करता है । बुराइयों को खण्डन करके सकारात्मक सुधार के लिए प्रेरित करता है । और समाज हमेशा सामाजिक दायरे से आगे बढ़ता चला जाता है । युग परिवर्तन के साथ समाज मे भी समानांतर परिवर्तन होता रहता है,, और उसी के अनुकूल साहित्य का सृजन होता रहा है ,,कभी देशप्रेम तो कभी नारी दुर्दशा ,कभी दहेज़ अभिशाप तो कभी बेटी बचाओ आदि ,,जब जब भी समाज मे कुरीतियां व्याप्त हुई साहित्य ने उसे नियंत्रित किया,,
साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नही बल्कि यह एक दर्पण है जो समाज को सच का बोध कराता रहा है । साहित्य मे फूहड़ता न हो , बिकाऊ न हो , हम सब ऐसे ही साहित्य का निर्माण करें यही मेरी कामना है ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
рд╢рдиिрд╡ाрд░, 26 рдЕрдЧрд╕्рдд 2017
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धार्मिक उन्माद- एक रोग
धर्म एक भावना है । धर्म मानवता के लिए बनाई गई सीढ़ी है । 'धार्यते धर्म:' अर्थात जीवन निर्वाह को धारण करने की विधि ही धर्म है । इस धर्म के (स्तम्भ) प्रवर्तक प्रायः ऋषि ,मुनि, महात्मा, पैगम्बर आदि रहे है ।
आज समाज की दिशा और दशा दोनों मे काफी परिवर्तन हुआ है । लोग धर्मान्धता और धार्मिक उन्माद की भावना से प्रेरित होकर मानवता पर प्रहार करने लगे है । और यह प्रहार निरंन्तर ज्वलंत होता जा रहा है ।
यदि हम मानव कन्यांण चाहते है तो मानवता की भावना से परे धार्मिक भावना का त्याग करना ही होगा ।
जो उचित है,सार्थक है, समयानुकूल है । धार्मिकता में कट्टरता और उन्माद रूपी खतरनाक रोगों का तो इलाज खोजना ही पड़ेगा । साहित्य ने हमेशा देश, काल, परिस्थिति की सेवा की है । साथ ही साथ जाति धर्म की भावना को परिमार्जित किया है । परन्तु आज एक ऐसी साहित्यिक जागरूकता की आवश्यकता महसूस हो रही है ,जो न राम रहीम या किसी अन्य धर्म प्रचारक के प्रति धार्मिक उन्माद को सच्चाई के दर्पण से देख सके, बल्कि समस्त धर्मो मे व्याप्त बुराइयों, रोगों, और व्यभिचारों को नेस्तोनाबूद कर सके । साहित्य आनंद के लिए कम जबकि धार्मिक ,राजनैतिक एवं सामाजिक सुधारवादी भावना को उत्प्रेरित करने के लिये अधिक लिखा जाय ।
भ्रस्ट हो रहे आज जो , ज्ञानी, नेक, प्रबुद्ध ।
साहित्यिक आह्वान से, करें ज्ञान को सुद्ध ।
राम केश मिश्र
рд╢рдиिрд╡ाрд░, 6 рдордИ 2017
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рд╢ुрдХ्рд░рд╡ाрд░, 14 рдЕрдк्рд░ैрд▓ 2017
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आनन्द के बाहर
23/10/14
आनन्द कहाँ है ? , "आनन्द के बाहर, भीतर तो अंधकार है । न दिखाई देता है । न सुनाई पड़ता है । अनुभव से परे ! " फिर कैसा आनन्द ? नही , आनन्द तो दिखाई देता है, सुनाई पड़ता है । आनन्द के बाहर आनन्द की प्राप्ति में सफलता कहाँ है ?" सफलता के बाहर सफलता के प्रयास मे ,संघर्ष मे , संघर्ष के समय । दुःख की आशंका होती है दुख नही । "
दुःखो को नष्ट करने की प्रक्रिया ही आनन्द है । सुख के आने तक की प्रक्रिया आनन्द है , समाप्ति के उपरांत नही । प्रक्रिया और प्रयास की समाप्ति सम्भव नही । आनन्द सम्भव नही । प्रयास की निरंतरता आनन्द की निरंतरता है । जीवन की निरंतरता है । प्रकृति की निरंतरता है । अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ को प्रकृति का आनन्द प्राप्त था । वह आनन्द प्रकृति को निहारने से उतपन्न था । उन्होंने प्रकृति को आत्मसात नही किया । वह चिंतन था, आत्मसात करने का प्रयास था और उसी मे आनन्द निहित था । जो कभी समाप्त नही हुआ ,प्राप्त नही हुआ क्योकि प्रयास समाप्त नही हुआ । प्राप्ति का आनन्द तो समाप्ति के दुःख है । अप्राप्ति का आनन्द तो अनवरत रहता है । निरन्तरता निहित होती है । जीवंत रहता है । पर कोई एक बिंदु नही , कोई एक चरण नही । कोई सुरुआत नही ।
सुकरात महान दार्शनिक था । जो दिन रात दर्शन मे लिप्त होने की कोशिश करता था । लिप्त न था ,प्रयास मे था । और जब एक दिन उसे विष भरे प्याले का आनन्द प्राप्त हुआ ,व्याप्त हुआ तो अंधकार था , शून्यता थी , अचेतनता थी । संज्ञान न था । उस आनन्द का , उस अंत का जिसकी खोज जारी थी । वह जानता था आनन्द तो मृत्यु के चरणों मे है , मृत्यु} मे नही ।
आनन्द की खोज , आनन्द का भाव , आनन्द की खोज मे मै भी निकला । उत्सुक था , खोज मे , प्रकृति मे भटका, झीलों मे झाँका, फूलों को निहारा । सन्ध्या मे नदियों के किनारों पर ढलते सूरज से पूछा । एकांत मे गया । बंजरों मे ठहरा । वर्षा मे लोटा । कुछ न मिला । भौतिकता मे भागा , शहरों तक पहुँचा । कीमती वाहनों मे बैठा , अध्ययन मे लगा । फिर भागा । डर गया , घर आया , बैठ गया वह भी चुपचाप । पुस्तको को खोला आनन्द के लिये । समय व्यर्थ हुआ । फ़ेसबुक पर पोस्ट किया, ट्वीटर पर ट्वीट किया । व्हाट्सएप पर स्टेटस चेंज किया ।हार कर गिर पड़ा , बिस्तर पर , कुछ न मिला । क्योंकि आनन्द तो हर जगह था , हर तरफ था , कण कण मे था । आनन्द तो मूलरूप मे शरीर मे निहित है । जिसे आत्मा कहते है । आत्मा मे आनन्द है । जिसे हम शरीर के बाहर ढूढ़ते है । आत्मा से प्रज्ज्वलित ज्योति रूपी आनन्द की अनुभूति आत्मा द्वारा फैलाये गये आवरण के आभास से होती है । चन्द्रमा की चाँदनी की अनुभूति वातावरण को निहारने से होती है चन्द्रमा से नही । उसकी समीपता से नही । चन्द्रमा भी सूर्य से आनन्द प्राप्त करता है । और उसी तरह से आत्मा परमात्मा से । चाँदनी को देखने से हम चाँदनी तो प्राप्त नही करते । बल्कि जितना गहन प्रयास करते है आनन्द का अनुभव उतना ही सुखद होता है । ठीक उसी तरह से हम आनन्द मे नही जा सकते । अनुभूति कर सकते है । क्योंकि आनन्द मे तो शांति है , अंधकार है, शून्यता है , निर्जीवता है, क्योकि आनन्द एक कल्पना है ।।
भाव हमारी मानसिकता के संदर्भ मे वातावरण का प्रभाव है । वास्तव मे इसके अंकुरण विद्यमान रहते है और यथासम्भव प्रभावी होते रहते है । ठीक उसी तरह आनन्द भी । जो स्वयं उत्तपन्न होता है और इसी विद्यमान आनन्द मे झाँकने की तारतम्यता बनाये रखना ही आनन्द की सुरुआत है । आनन्द है ।
©© राम केश मिश्र
рдмुрдзрд╡ाрд░, 22 рдоाрд░्рдЪ 2017
рдЬीрд╡рди рдПрдХ рд░ाрд╕्рддा ।
!****उम्र एक रास्ता ****!
उम्र एक ठहराव हैं और जीवन एक रास्ता हैं ,एक पगडण्डी हैं, हमें तय करना हैं मंजिल को मॄत्यु को । चलना तो पडेगा । चाहे स्लो चाहे फास्ट ।
टाइम हैं पथ प्रदर्शक । उसी के साथ चलना हैं ,हमको और तुमको भी ।
और प्रकृति की चुनौतियों को भी करना हैं स्वीकार जो हम सबका हैं अधिकार ।
शरीर तय करता हैं दूरी ,चाहे चाहत रहे अधूरी ,या हो कोई मजबूरी
तन की ,मन की ।।
और एक दिन मिट जायेगा फासला
रखना हैं सबको हौसला । चाहे हो बुरा चाहे हो भला ।क्योंकि उम्र तो हैं एक पडाव जबकि मॄत्यु हैं अन्तिम ठहराव ।।
धन्यवाद