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                    आनन्द के बाहर 
                       23/10/14

आनन्द कहाँ है ? , "आनन्द के बाहर, भीतर तो अंधकार है । न दिखाई देता है । न सुनाई पड़ता है । अनुभव से परे ! " फिर कैसा आनन्द ? नही , आनन्द तो दिखाई देता है, सुनाई पड़ता है । आनन्द के बाहर आनन्द की प्राप्ति में सफलता कहाँ है ?" सफलता के बाहर सफलता के प्रयास मे ,संघर्ष मे , संघर्ष के समय । दुःख की आशंका होती है दुख नही । "

दुःखो को नष्ट करने की प्रक्रिया ही आनन्द है । सुख के आने तक की प्रक्रिया आनन्द है , समाप्ति के उपरांत नही । प्रक्रिया और प्रयास की समाप्ति सम्भव नही । आनन्द सम्भव नही । प्रयास की निरंतरता आनन्द की निरंतरता है । जीवन की निरंतरता है । प्रकृति की निरंतरता है । अंग्रेजी कवि  वर्ड्सवर्थ को प्रकृति का आनन्द प्राप्त था । वह आनन्द प्रकृति को निहारने से उतपन्न था । उन्होंने प्रकृति को आत्मसात नही किया । वह चिंतन था, आत्मसात करने का प्रयास था और उसी मे आनन्द निहित था । जो कभी समाप्त नही हुआ ,प्राप्त नही हुआ क्योकि प्रयास समाप्त नही हुआ । प्राप्ति का आनन्द तो समाप्ति के दुःख है । अप्राप्ति का आनन्द तो अनवरत रहता है । निरन्तरता निहित होती है । जीवंत रहता है । पर कोई एक बिंदु नही , कोई एक चरण नही । कोई सुरुआत नही ।
        सुकरात महान दार्शनिक था । जो दिन रात दर्शन मे लिप्त होने की कोशिश करता था । लिप्त न था ,प्रयास मे था । और जब एक दिन उसे विष भरे प्याले का आनन्द प्राप्त हुआ ,व्याप्त हुआ तो अंधकार था , शून्यता थी , अचेतनता थी । संज्ञान न था । उस आनन्द का , उस अंत का जिसकी खोज जारी थी । वह जानता था आनन्द तो मृत्यु के चरणों मे है , मृत्यु} मे नही ।
       आनन्द की खोज , आनन्द का भाव , आनन्द की खोज मे मै भी निकला । उत्सुक था , खोज मे , प्रकृति मे भटका, झीलों मे झाँका, फूलों को निहारा । सन्ध्या मे नदियों के किनारों पर ढलते सूरज से पूछा । एकांत मे गया । बंजरों मे ठहरा । वर्षा मे लोटा । कुछ न मिला । भौतिकता मे भागा , शहरों तक पहुँचा । कीमती वाहनों मे बैठा , अध्ययन मे लगा । फिर भागा । डर गया , घर आया , बैठ गया वह भी चुपचाप । पुस्तको को खोला आनन्द के लिये । समय व्यर्थ हुआ । फ़ेसबुक पर पोस्ट किया,  ट्वीटर पर ट्वीट किया । व्हाट्सएप पर स्टेटस चेंज किया ।हार कर गिर पड़ा ,  बिस्तर पर , कुछ न मिला । क्योंकि आनन्द तो हर जगह था , हर तरफ था , कण कण मे था । आनन्द तो मूलरूप मे शरीर मे निहित है । जिसे आत्मा कहते है । आत्मा मे आनन्द है । जिसे हम शरीर के बाहर ढूढ़ते है । आत्मा से प्रज्ज्वलित ज्योति रूपी आनन्द की अनुभूति  आत्मा द्वारा फैलाये गये आवरण के आभास से होती है । चन्द्रमा की चाँदनी की अनुभूति वातावरण को निहारने से होती है चन्द्रमा से नही । उसकी समीपता से नही । चन्द्रमा भी सूर्य से आनन्द प्राप्त करता है । और उसी तरह से आत्मा परमात्मा से । चाँदनी को देखने से हम चाँदनी तो प्राप्त नही करते । बल्कि जितना गहन प्रयास करते है आनन्द का अनुभव उतना ही सुखद होता है । ठीक उसी तरह से हम आनन्द मे नही जा सकते । अनुभूति कर सकते है । क्योंकि आनन्द मे तो शांति है , अंधकार है, शून्यता है ,  निर्जीवता है, क्योकि आनन्द एक कल्पना है ।।
    भाव हमारी मानसिकता के संदर्भ मे वातावरण का प्रभाव है । वास्तव मे इसके अंकुरण विद्यमान रहते है और यथासम्भव प्रभावी होते रहते है । ठीक उसी तरह आनन्द भी । जो स्वयं उत्तपन्न होता है और इसी विद्यमान आनन्द मे झाँकने की तारतम्यता बनाये रखना ही आनन्द की सुरुआत है । आनन्द है । 

                               ©© राम केश मिश्र

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