विषय--------
"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहाँ तक है?"
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सत्य को सत्य ठहराने तक है । असत्य पर सत्य की छाप डालने तक है । जहाँ पर दूसरों की भावनाएँ आहत होती है वही पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिधि आरम्भ होती है ।परन्तु यह परिधि लोचदार होती है । क्योंकि बुरे व्यक्ति को एक अच्छी सलाह देने पर भी- दूषित मानसिकता के कारण -उसकी भावनाओं को ठेष पहुँचती है ।
हमे बोलने की आजादी है का मतलब ये नही है कि बिना आधार के ही हम वाक्यो के स्तम्भ खड़े करने लगे । हाँ, व्यंग्यो का भी एक आदर्श होता है ।
एक सीख होती है । सत्यता होती है । आप व्यंग्य बोल सकते है तो खुलकर बोलिये , हम भी दो चार व्यंय उसी में जोड़ देगे । पर आप व्यंग्य वाण (चोर को चोर कहना) के लिये स्वतन्त्र नही है । आप कटु सत्य बोल सकते हो पर कटु वचन नही ।
मुझे खेद है और अफ़सोस भी । इस चुनावी दौर में नेता ,नेता की बुराई कर रहा है । मंत्री, मंत्री की बुराई कर रहा है । और जब बात अपनी आती है तो वाह रे मैं ,वाह रे मै ।ये किया, वो किया । साथ साथ चुनावी वादों को भी समांतर क्रम में रख कर निष्कर्ष निकालें तो वाहहः मेरे देश रूपी नाव के खेवनहारों ।
भरोशा उठ जाता है । यह उनकी स्वतंत्रता है या दूसरों की स्वतंत्रता में दखलंदाजी ???
आप बोलिये आप स्वतन्त्र है । आपमें मानवीयता हो तो । आपमें सज्जनता हो तो । आपकी धारा प्रवाह वाणी में निजता के साथ साथ सरसता हो तो । आप काफी हद तक बुरे लोगो की बुराई भी करने के लिए स्वतंत्र है पर आप बुरे न हो तो ।
एक दोहा----
निर्मल पावन राखिये ,वाणी की अभिव्यक्ति ।
ध्यान रहे व्यक्तित्व का ,,, कहलावोगे व्यक्ति ।।
©© राम केश मिश्र