рд╕ोрдорд╡ाрд░, 6 рдЬूрди 2016

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                       चोर की भैंस

         जी हा चोर की भैंस । काली है तो क्या हुआ । चोर और कालापन साथ न हो ! अनहोनी । भैंस चौखट पर ही रहती है । ईमानदार आते है और झूठा सम्मान दिखाकर कहते है । भैस तो बहुत सुंदर है । और चोर वाह्ह्ह् 'चोर चोर मौसेरे भाई' क्या कहने । बेचारा ईमानदार 'जेहि विधि होय नाथ हित मोरा। और अपना काम बनेगा कहिया ' पार लगा दे मोरी नइया । कहते हुये शर्म के मारे छछूंदर बने आते है ।
       घर आते है भैंस उन्ही की ही है । ईमानदारी के चोले में मजबूरी की बटन लगाये । 'चौबे बनने गये छब्बे दूबे बनकर लौटे ।' यही है अपना समाज। यही है हम आप । अपनी ही भैंस को खरीदना क्या कहेगे । 'वाह्ह्ह् रे कबीर 'बारी फेरी बलि गयी । जित देखु तित तू।
खुली आँखों से क्या देखू । मेरे मौला बता दे तू ।
अमन इंसाफ़ की कोई नयी दुनिया बसा दे तू ।।

और भी ।
बन्द करो ये अलख लगाना ,मांग नही अब वार करो ।
भैंस चुराकर भाग न पाये, ज़ख्म नही प्रहार करो ।

                             ©©©  राम केश मिश्र

рд╢рдиिрд╡ाрд░, 28 рдордИ 2016

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             दाढ़ी में तिनका ।व्यंग्य।

एक पुरानी कहावत है । चोर की दाढ़ी में तिनका । आजकल इतनी चर्चित हो रही है कि नेता , अभिनेता,क्रिकेटर यहा तक कि उद्योगपति भी दाढ़ी बनवाने से कतरा रहे है । बेचारे नाई गण "अखियाँ हरि दर्शन को प्यासी " की आस लिये सच्चाई के छुरे की धार तेज कर रहे है । वह तो कुंद हो गया है । आख़िर दाढ़ी बंनाने विदेश कौन जाये ।
     उधर सन्तों की दाढ़ी का क्या कहना 'तिनका ही तिनका । मगर सधुक्कड़ी का चोला  " सन्तों भाई आई ज्ञान की आंधी रे'और "माया रही न बांधी रे" चिल्ला चिल्ला के भृमित कर दिए है । मतलब कोई भी तिनका अब दाढ़ी में नही है ।
         चुनाव आते ही 'मगहु मेघा' की तरह फ़ूले नही समाते । 'चोर चोर मौसेरे भाई' ।तब सधुक्कड़ी दाढ़ी के सुझाव पर खेजाब लगाये : "अब की राख लेहु भगवान"और "हम न मरब मरिहै संसार " दोनों का राग अलापते है । बेचारी जनता। "उधौ विनती सुनो हमारी' 
सूखा बाढ़ के पैसा खायो , हमका समझे गाय दुधारी ।"      अब तो दाढ़ी में तिनका है पर दिखता नही ।  जनता के सामने आते ही गर्मी का बहाना बताने लगते है । नये नये प्रलोभन रूपी गमछा लपेटे है । वाह्ह रे तिनका .....

                       .         © राम केश मिश्र