चोर की भैंस
जी हा चोर की भैंस । काली है तो क्या हुआ । चोर और कालापन साथ न हो ! अनहोनी । भैंस चौखट पर ही रहती है । ईमानदार आते है और झूठा सम्मान दिखाकर कहते है । भैस तो बहुत सुंदर है । और चोर वाह्ह्ह् 'चोर चोर मौसेरे भाई' क्या कहने । बेचारा ईमानदार 'जेहि विधि होय नाथ हित मोरा। और अपना काम बनेगा कहिया ' पार लगा दे मोरी नइया । कहते हुये शर्म के मारे छछूंदर बने आते है ।
घर आते है भैंस उन्ही की ही है । ईमानदारी के चोले में मजबूरी की बटन लगाये । 'चौबे बनने गये छब्बे दूबे बनकर लौटे ।' यही है अपना समाज। यही है हम आप । अपनी ही भैंस को खरीदना क्या कहेगे । 'वाह्ह्ह् रे कबीर 'बारी फेरी बलि गयी । जित देखु तित तू।
खुली आँखों से क्या देखू । मेरे मौला बता दे तू ।
अमन इंसाफ़ की कोई नयी दुनिया बसा दे तू ।।
और भी ।
बन्द करो ये अलख लगाना ,मांग नही अब वार करो ।
भैंस चुराकर भाग न पाये, ज़ख्म नही प्रहार करो ।
©©© राम केश मिश्र