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विषय-साहित्य और समाज

      समाज तन है और साहित्य मन । समाज सेव्य है साहित्य सेवक । साहित्य हमेसा ही समाज की दिशा और दशा मे सुधार करता है । जैसे छोटे से पौधे को खाद, पानी, वायु,आदि मिलने से कालांतर मे वह एक विशालतम वृक्ष मे परिवर्तित हो जाता है उसी प्रकार से साहित्य भी समाज को प्रचुर मात्रा मे दुर्गणों का बोध कराते हुए ,सद्गुणों के बीज बोता है । साथ ही साथ सामाजिक कुरीतियों, विघटनकारी परम्पराओं ,जातीय बिसङ्गतियों पर व्यंग्य वाणों से प्रहार करके बड़ी शालीनता से जनमानस मे  मानवतावादी दृष्टिकोण उपजाता है ।

         साहित्य हमेशा सभ्य समाज की कल्पना करता है । निर्माण करता है । बुराइयों को खण्डन करके सकारात्मक सुधार के लिए प्रेरित करता है । और समाज हमेशा सामाजिक दायरे से आगे बढ़ता चला जाता है । युग परिवर्तन के साथ समाज मे भी समानांतर परिवर्तन होता रहता है,, और उसी के अनुकूल साहित्य का सृजन होता रहा है ,,कभी देशप्रेम तो कभी नारी दुर्दशा ,कभी दहेज़ अभिशाप तो कभी बेटी बचाओ आदि ,,जब जब भी समाज मे कुरीतियां व्याप्त हुई साहित्य ने उसे नियंत्रित किया,, 

        साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नही बल्कि यह एक दर्पण है जो समाज को सच का बोध कराता रहा है ।  साहित्य मे फूहड़ता न हो , बिकाऊ न हो , हम सब ऐसे ही साहित्य का निर्माण करें यही मेरी कामना है ।
                                   ✍रकमिश सुल्तानपुरी

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