धार्मिक उन्माद- एक रोग
धर्म एक भावना है । धर्म मानवता के लिए बनाई गई सीढ़ी है । 'धार्यते धर्म:' अर्थात जीवन निर्वाह को धारण करने की विधि ही धर्म है । इस धर्म के (स्तम्भ) प्रवर्तक प्रायः ऋषि ,मुनि, महात्मा, पैगम्बर आदि रहे है ।
आज समाज की दिशा और दशा दोनों मे काफी परिवर्तन हुआ है । लोग धर्मान्धता और धार्मिक उन्माद की भावना से प्रेरित होकर मानवता पर प्रहार करने लगे है । और यह प्रहार निरंन्तर ज्वलंत होता जा रहा है ।
यदि हम मानव कन्यांण चाहते है तो मानवता की भावना से परे धार्मिक भावना का त्याग करना ही होगा ।
जो उचित है,सार्थक है, समयानुकूल है । धार्मिकता में कट्टरता और उन्माद रूपी खतरनाक रोगों का तो इलाज खोजना ही पड़ेगा । साहित्य ने हमेशा देश, काल, परिस्थिति की सेवा की है । साथ ही साथ जाति धर्म की भावना को परिमार्जित किया है । परन्तु आज एक ऐसी साहित्यिक जागरूकता की आवश्यकता महसूस हो रही है ,जो न राम रहीम या किसी अन्य धर्म प्रचारक के प्रति धार्मिक उन्माद को सच्चाई के दर्पण से देख सके, बल्कि समस्त धर्मो मे व्याप्त बुराइयों, रोगों, और व्यभिचारों को नेस्तोनाबूद कर सके । साहित्य आनंद के लिए कम जबकि धार्मिक ,राजनैतिक एवं सामाजिक सुधारवादी भावना को उत्प्रेरित करने के लिये अधिक लिखा जाय ।
भ्रस्ट हो रहे आज जो , ज्ञानी, नेक, प्रबुद्ध ।
साहित्यिक आह्वान से, करें ज्ञान को सुद्ध ।
राम केश मिश्र
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