होली का दिन । वाह ! रंग और गुलाल । सब जुट गये हैं ,अपने अपने पसन्द के रंग ढूँढने । और ब्यंग रूपी पिचकारी तान लिये हैं । ढूंढ रहे हैं ।कोई तो बलि का बकरा बने ।।
हमारे समाज के रंग ।।बिना होली के ही सबके सब भीगे हुये हैं ।उदासी का रंग । हँसी का रंग ।सच्चाई का रंग । ईमानदारी का रंग ।बेईमानी का रंग । होली तो सब खेल रहे हैं।।
और यही नहीं जो ईमानदारी का चोला पहने हैं ।उनकी पिचकारी थोड़ी छोटी हैं ।। और जो बचे हैं गुलालों से काम चला ले रहे है ।।
रंगों के छींटे बदरंगी समाज पर फैल रहा हैं । सभी बेरंग होना चाहते हैं ।और इसीलिये जुआड रूपी काली चादर ओढ़ लिये हैं ।।
उधर अमीरी का रंग । गरीबी का रंग अलग राग अलाप रहा हैं ।। बदल रहा हैं ।दल बदलू सरकार की तरह । आप भी सावधान रहिए । इस होली में ।।
धन्यवाद