दाढ़ी में तिनका ।व्यंग्य।
एक पुरानी कहावत है । चोर की दाढ़ी में तिनका । आजकल इतनी चर्चित हो रही है कि नेता , अभिनेता,क्रिकेटर यहा तक कि उद्योगपति भी दाढ़ी बनवाने से कतरा रहे है । बेचारे नाई गण "अखियाँ हरि दर्शन को प्यासी " की आस लिये सच्चाई के छुरे की धार तेज कर रहे है । वह तो कुंद हो गया है । आख़िर दाढ़ी बंनाने विदेश कौन जाये ।
उधर सन्तों की दाढ़ी का क्या कहना 'तिनका ही तिनका । मगर सधुक्कड़ी का चोला " सन्तों भाई आई ज्ञान की आंधी रे'और "माया रही न बांधी रे" चिल्ला चिल्ला के भृमित कर दिए है । मतलब कोई भी तिनका अब दाढ़ी में नही है ।
चुनाव आते ही 'मगहु मेघा' की तरह फ़ूले नही समाते । 'चोर चोर मौसेरे भाई' ।तब सधुक्कड़ी दाढ़ी के सुझाव पर खेजाब लगाये : "अब की राख लेहु भगवान"और "हम न मरब मरिहै संसार " दोनों का राग अलापते है । बेचारी जनता। "उधौ विनती सुनो हमारी'
सूखा बाढ़ के पैसा खायो , हमका समझे गाय दुधारी ।" अब तो दाढ़ी में तिनका है पर दिखता नही । जनता के सामने आते ही गर्मी का बहाना बताने लगते है । नये नये प्रलोभन रूपी गमछा लपेटे है । वाह्ह रे तिनका .....
. © राम केश मिश्र
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